सती प्रथा एक मनगढंत, काल्पनिक प्रथा थी और कभी भी हिंदुओं में चलन ने नहीं थी इसे साबित करने में 30 सेकंड से अधिक का समय नहीं लगेगा।
सती शब्द संस्कृत के सत से बना है मतलब सत्य या सच्चा। महिलाओं के संदर्भ में सती का अर्थ हुआ सच्ची पत्नी या वफादार पत्नी।
सती अनुसुइया की कहानी याद हो जिसमे उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु और महेश को बच्चा बना दिया था। अनुसुइया कोई जादूगर नहीं थी। उन्होंने तीनो देवों को अपने सतीत्व की शक्ति से बच्चा बना दिया। जिसका अर्थ हुआ कि अनुसुइया जिंदा रहते हुए भी सती थी पर ईसाई मिशनरियों और वामपंथी इतिहासकारों ने प्रचारित किया कि हिंदुओं में पत्नी, चिता पर जल कर मर जाति थी उसे सती कहते थे।
जबकि सती शब्द की अर्थ के अनुसार किसी भी वफादार "जिंदा" पत्नी को सती कहा जा सकता है।
दूसरा उदाहरण सावित्री का जिन्होंने अपने सतीत्व के बल पर यमराज से अपने पति को जिंदा करवा लिया। मतलब सावित्री भी जिंदा होते हुए सती थी।
अहिल्या और माता सीता भी सती थी पर इन दोनों ने भी जल कर आत्मदाह नहीं किया।
माद्री को कई लेखों में अम्बेडकरवादियों द्वारा सती दिखाया गया जबकि सच्चाई कुछ और है। दुर्वासा का पांडु को शाप था कि जिस दिन पांडु अपनी पत्नी से सहवास करेंगे उनकी उसी दिन मौत हो जाएगी। पाण्डु ने इसीलये अपनी पत्नियों से दूरी बना के रखी क्योंकि वे मरना नहीं चाहते थे पर एक दिन माद्री नदी से नहा कर बिना कपड़ों के निकली और उन्हें देख कर पांडु ने अपना संयम खो दिया और पाण्डु ने माद्री से सहवास किया इसके बाद पाण्डु का देहांत हुआ। माद्री ने ने खुद को पाण्डु की मौत का जिम्मेदार मान कर आत्महत्या की जिसे भीमटों, ईसाईयों और मुल्लों ने हिंदुओं की सती प्रथा कह के झूठा प्रचार किया।
शिव की पत्नी पार्वती ने भी सती नहीं किया बल्कि झगड़े के परिणाम स्वरूप अग्निकुंड में कूद कर आत्महत्या की।
इतिहास में कई विधवाएं हुयीं पर किसी ने आत्मदाह नहीं किया। रावण की विधवा पत्नी मंदोदरी, राम की तीनों माताएं विधवा थी, पर आत्मदाह नहीं किया। अंग्रेज़ो से आने से पहले शिवाजी की माता जीजाबाई ने भी विधवा होते हुए आत्मदाह नहीं किया।
राजस्थान में क्षत्रिय राजपूत परिवार की महिलाओं ने युद्ध में मारे गए अपने पतियों के वियोग में आत्महत्याएं की जो सिर्फ राज परिवार तक की इक्का दुक्का घटना थी यानी साधारण क्षत्रियों की महिलाएं भी आत्मदाह नहीं करतीं थीं। इतिहास में कोई सबूत नहीं कि ब्राह्मणों और वैश्यों की महिलाओं भी कभी इस तथाकथित सती प्रथा का पालन किया पर इतिहास में सम्पूर्ण हिंदुओं की प्रथा बात कर हिन्दू समाज को बदनाम किया गया है। राजा राम मोहन रॉय ने भले ही राजपूत स्त्रियों को युद्ध मे मरने वाले पतियों के वियोग में आत्मदाह न करने की सलाह दी हो पर उनका नाम इतिहासकारों ने सती प्रथा खत्म करने में गलत तरीके से जोड़ा है ताकि इनका नाम सुन कर लगे कि वास्तव में सती प्रथा थी। हिन्दू भी अपने बचाव में कहते फिरते हैं कि सती प्रथा अतीत में होती थी, अब तो नहीं होता। जबकि उन्हें कहना चाहिए कि सती प्रथा कभी थी ही नहीं
सती का उल्लेख किसी भी हिन्दू धर्म की पुस्तक में नहीं मिलता, किसी वेद में भी नहीं, यहां तक की मनुस्मृति में भी नहीं।
हिन्दू धर्म के खिलाफ इतनी नकारत्मकता पिछले सैकड़ों सालों में जानबूझ कर फैलाई है। अभी हाल में हुए कठुआ मामले में मीडिया और ईसाई, मुस्लिमों ने प्रचार किया कि मंदिर में 8 वर्षीय आसिफा का बलात्कार कर के हत्या कर दी जो की झूठ साबित हुई। 2 पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट में लड़की का बलात्कार साबित नहीं हुआ। लड़की की हत्या कहीं और की और उसे हिन्दू धर्म को बदनाम करने के लिए उसे मंदिर में फेंक दिया।
मतलब, यही घटना आज से 500 साल पहले हुई होती तो शायद सती प्रथा की तरह एक और कहानी पाठ्य पुस्तकों में दर्ज हो जाती कि ब्राह्मण मंदिरों में छोटी बच्चियों का बलात्कार करके उनकी हत्या कर देता था इस प्रथा को खत्म करने श्रेय भी किसी ब्रिटिश अधिकारी या किसी राजा राममोहन रॉय जैसे दूसरे व्यक्ति को दे दिया जाता।
जिस तरह आसिफा के साथ मंदिर में बलात्कार की मनगढंत कहानी रची गई ....
...उसी तरह सती प्रथा की मनगढंत कहानी रची गई;
...उसी तरह ब्राह्मणों द्वारा देवदासियों के शोषण की कहानी रची गई;
...उसी तरह ब्राह्मणों द्वारा दलितों के शोषण की कहानी रची गई;
...उसी तरह बहिष्कृत वेश्यावृत्ति, आपराधिक और गद्दार जातियों को मनुस्मृति द्वारा अछूत बनाने की कहानी रची गयी;
...उसी तरह कांग्रेस ने 2008 में मुम्बई हमला संघ द्वारा प्रायोजित करने और हिन्दू आतंकवाद की मनगढंत कहानी लिखी;
...उसी तरह आर्यन द्रविड़ियन अलग-अलग नस्लों का मनगढंत कहानी लिखी गयी;
...उसी तरह ये मनगढंत कहानियां बनातें हैं कि दलित को मूंछ नहीं रखने दी, दलित को घोड़ी पर नहीं चढ़ने दिया, दलित की जाति मंदिर में पूछी गई।
आसिफा के मामले का सच तो हमारी तत्परता के कारण सामने आ गया है और ऐसी ही तत्परता अगर इतिहास में लिखी झूठी शोषण की कहानियों के खिलाफ दिखाएं तो आरक्षण और हरिजन एक्ट खत्म करने में कुछ दिन से अधिक का समय नहीं लगेगा।


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