"पापा, प्लीज आप मत आना मेरे स्कूल की पेरेंट्स टीचर मीटिंग में। “ बेटे के मुँह से यह सुनते ही उसका खून खौल गया।
“क्या बोल रहे हो आशीष ?” पत्नी जैसे उसके चेहरे के भाव समझ गयी थी।
“ मेरा भी तो कुछ स्टैण्डर्ड है अपने दोस्तों के बीच! इनका क्या है, ना तो ढंग का मोबाइल, ना ब्रांडेड कपड़े और ना ही अच्छी कार!!” आशीष अपने बैग में कुछ ढूँढते हुए बोला।
“ आशीष! तमीज़ रह गयी है की नहीं तुममें कुछ? कैसे बोल रहे हो पापा के लिए?” पत्नी ने बेटे को जोर से डाँटा।
“ मम्मा, प्लीज़ ! आप तो रहने ही दो! मुझे शर्म आती है आप दोनों को अपने दोस्तों से मिलवाने में। मैं मैनेज़ कर लूँगा स्कूल में। कह दूँगा आप लोग कहीं बाहर फॉरेन ट्रिप पर गए हुए हैं । हाँ यही बेस्ट है । “आशीष का दिमाग बड़ी तेज़ी से चल रहा था।
इंटरनेशनल स्कूल में बच्चे के एडमिशन की लालसा, उसकी दैत्याकार फीस, अच्छी सोसाइटी में घर, स्टैण्डर्ड मेंटेन करने का प्रेशर ….और इन सब के लिए लिया उसने क्रेडिट कार्ड का सहारा। लोन चुकाने के लिए अपनी उम्र का एक बड़ा और कीमती हिस्सा, पति-पत्नी ऑफिस में दिन-रात ओवर टाइम करने में गुज़ार रहे थे।
उसका दम सा घुटने लगा। एक ग्लास पानी पीकर कुछ रिलैक्स हुआ।
“साक्षी, ट्रिप पर जाने की तैयारी कर लो , हम लोग अगले महीने पेरिस जायेंगे। आशीष को एक वीक के लिए उसकी दादी के घर छोड़ देंगें। आखिर झूठ बोलने की क्या ज़रूरत उसे?” पत्नी भौचक्की सी देख रही थी।
“ मैं वीज़ा के लिए अप्लाई करता हूँ और हाँ सुनो, आज से आशीष की पॉकेट मनी हॉफ। आखिर कहीं तो बचत करनी ही होगी।” कहता हुआ वह अपने कमरे की ओर बढ़ गया।
“ मम्मा, आई म सॉरी, पेरिस तो मेरा ड्रीमलैंड है ..मेरे बिना आप लोग कैसे जा सकते हो?” आशीष गिरगिट की तरह रंग बदल चुका था।
दिखावे के स्टैण्डर्ड को बनाने में की गई गलतियों का परिणाम ही आज, आशीष की आवाज़ बन कर , उसके कानों में गर्म सलाखों की तरह तप रहा था।

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