मैं और पिताजी चुपचाप माँ का दैनिक प्रवचन सुन रहे थे,
"आप हमेशा उसका पक्ष लेते हैं।विनोद से क्या कहें, वो तो है ही बीवी का गुलाम! एक काम ढंग से नहीं करती, बस पर्स लटकाया और चल दीं स्कूल। हर बात पर जवाब देती है। बहुत तेज़ है मास्टरनी!"
मैं समझ नहीं पाती थी कि माँ को क्या खराब लगता है? भाभी का पर्स लटकाना, गलत बात पर जवाब देना या 'मास्टरनी' होना? घर के काम करती हैं, सबका ध्यान रखती हैं, फिर भी?
शाम को लगभग चार बजे घंटी बजी। भाभी ने जाली वाला दरवाज़ा खोला,
"हम लोग भारत गैस से आए हैं, आपके गैस चूल्हे के मरम्मत के लिए। ये सेवा चुनिंदा ग्राहकों को मुफ़्त दी जाती है, ये देखिए आई-कार्ड।"
"लेकिन हमने तो इसके लिए कोई फोन नहीं किया,"भाभी आश्वस्त नहीं लग रही थीं।
तब तक माँ शुरू हो गईं, "देखा!अब उनसे बहस कर रही है। जब पैसा नहीं ले रहे हैं तो काहे अंदर नहीं आने दे रही है... "
माँजी की बात अधूरी रह गई। भाभी दहाड़ रही थीं, "नकली आई-कार्ड दिखाकर बेवकूफ बनाते हो! रुको अभी पुलिस बुलाती हूँ... भाग क्यों रहे हो... दिन-दहाड़े तुम लोग लूट-पाट..."
मैंने छज्जे से झाँककर देखा, वो लोग भाग चुके थे। पूरी बात समझते ही माँ थर-थर काँपने लगीं, पिताजी ने उन्हें सहारा देकर बैठाया और मुस्कुराते हुए बोले "कितना बड़ा हादसा टल गया! तुम सही कहती हो; बहुत तेज़ है अपनी मास्टरनी!"
Also read-: http://kuchbhikahise.blogspot.com/2018/05/blog-post_22.html?m=1
"आप हमेशा उसका पक्ष लेते हैं।विनोद से क्या कहें, वो तो है ही बीवी का गुलाम! एक काम ढंग से नहीं करती, बस पर्स लटकाया और चल दीं स्कूल। हर बात पर जवाब देती है। बहुत तेज़ है मास्टरनी!"
मैं समझ नहीं पाती थी कि माँ को क्या खराब लगता है? भाभी का पर्स लटकाना, गलत बात पर जवाब देना या 'मास्टरनी' होना? घर के काम करती हैं, सबका ध्यान रखती हैं, फिर भी?
शाम को लगभग चार बजे घंटी बजी। भाभी ने जाली वाला दरवाज़ा खोला,
"हम लोग भारत गैस से आए हैं, आपके गैस चूल्हे के मरम्मत के लिए। ये सेवा चुनिंदा ग्राहकों को मुफ़्त दी जाती है, ये देखिए आई-कार्ड।"
"लेकिन हमने तो इसके लिए कोई फोन नहीं किया,"भाभी आश्वस्त नहीं लग रही थीं।
तब तक माँ शुरू हो गईं, "देखा!अब उनसे बहस कर रही है। जब पैसा नहीं ले रहे हैं तो काहे अंदर नहीं आने दे रही है... "
माँजी की बात अधूरी रह गई। भाभी दहाड़ रही थीं, "नकली आई-कार्ड दिखाकर बेवकूफ बनाते हो! रुको अभी पुलिस बुलाती हूँ... भाग क्यों रहे हो... दिन-दहाड़े तुम लोग लूट-पाट..."
मैंने छज्जे से झाँककर देखा, वो लोग भाग चुके थे। पूरी बात समझते ही माँ थर-थर काँपने लगीं, पिताजी ने उन्हें सहारा देकर बैठाया और मुस्कुराते हुए बोले "कितना बड़ा हादसा टल गया! तुम सही कहती हो; बहुत तेज़ है अपनी मास्टरनी!"
Also read-: http://kuchbhikahise.blogspot.com/2018/05/blog-post_22.html?m=1


0 टिप्पणियाँ