देखो बौखलाए मियां, वैसे तो तुम्हारी दो पैसे की औकात नहीं
रह गई है.. तो फालतू बयानबाजी करके सुर्खियां बटोरना छोड
दो.. फिर भी मेरा ये एक जवाब है तुम जैसे फुद्दुओं के लिये..
पहली बात तो ये कि बुर्का बैन का समर्थन करके हीरो बनने की
और घूंघट बैन को लेकर हमें नीचा दिखाने की कोशिश न करो..
हिंदुओं ने अनेक बुरी प्रथाओं का त्याग किया है और आगे भी करते
रहेंगे.. बाल विवाह, पर्दा प्रथा, सती प्रथा और बहुत से और
रिवाज जो समय के अनुकूल नहीं थे हमने सब बदले.. लेकिन तुम लोगों
के साथ उल्टा है..
दूसरी बात ये कि आज तक कोई घूंघट वाली बम बांध कर नहीं फटी
तुम्हारे वाले उदाहरण हजार हैं..
तीसरी बात ये कि गांव देहात को छोड कर कितनी हिंदू
महिलायें घूंघट में दिखाई देती हैं.? और गांव देहात वाली औरतें भी
बमुश्किल आंखें ढकने तक का घूंघट करती है.. घूंघट का मुख्य मकसद
होता था, सिर ढके रखना ताकि अपना और सामने वाले के
सम्मान रख सकें और आंखों को ना मिलने देना.. क्योंकि चरित्र
हनन सबसे पहले नजर मिलने पर होता है..
चौथी बात.. घूंघट की आड में कोई मर्द नहीं छुप सकता जबकि बुर्के
में ऐसा हो सकता है और हथियार ले जाना तो सबसे ज्यादा
आसान है..इसलिये सुरक्षा की दृष्टि से ये सबसे खतरनाक है..
पांचवी बात.. तुम्हारी औरतों को बुर्के से आजादी दिलाने की
लडाई हमको लडनी पड रही है जबकि हमारी लडकियों को कोई
ड्रेस पर भाषण दे तो वो हीं सामने वाले को झाड देती हैं.. एक दो
दिन पहले गुडगांव में ही हुआ है..
छठी बात.. मुगलों के आने से पहले हिंदुस्तान की औरतें घूंघट नहीं
करती थी.. नीच बलात्कारी मुगलों की गंदी नजरों से बचने के
लिये औरतों नें पर्दा करना शुरु किया..
इसलिये महाशय.. अपनी औरतों के लिये कुछ कीजिये बजाय मुद्दा
हमारी ओर भटकाने के..
क्योंकि हमारी औरतों नें जरुरत पडने पर घूंघट छोडकर, बच्चे को
पीठ पर बांधकर, मुंह में घोडे की लगाम दबा कर दोनों हथियारों से
तलवारें चलाई हैं..
रह गई है.. तो फालतू बयानबाजी करके सुर्खियां बटोरना छोड
दो.. फिर भी मेरा ये एक जवाब है तुम जैसे फुद्दुओं के लिये..
पहली बात तो ये कि बुर्का बैन का समर्थन करके हीरो बनने की
और घूंघट बैन को लेकर हमें नीचा दिखाने की कोशिश न करो..
हिंदुओं ने अनेक बुरी प्रथाओं का त्याग किया है और आगे भी करते
रहेंगे.. बाल विवाह, पर्दा प्रथा, सती प्रथा और बहुत से और
रिवाज जो समय के अनुकूल नहीं थे हमने सब बदले.. लेकिन तुम लोगों
के साथ उल्टा है..
दूसरी बात ये कि आज तक कोई घूंघट वाली बम बांध कर नहीं फटी
तुम्हारे वाले उदाहरण हजार हैं..
तीसरी बात ये कि गांव देहात को छोड कर कितनी हिंदू
महिलायें घूंघट में दिखाई देती हैं.? और गांव देहात वाली औरतें भी
बमुश्किल आंखें ढकने तक का घूंघट करती है.. घूंघट का मुख्य मकसद
होता था, सिर ढके रखना ताकि अपना और सामने वाले के
सम्मान रख सकें और आंखों को ना मिलने देना.. क्योंकि चरित्र
हनन सबसे पहले नजर मिलने पर होता है..
चौथी बात.. घूंघट की आड में कोई मर्द नहीं छुप सकता जबकि बुर्के
में ऐसा हो सकता है और हथियार ले जाना तो सबसे ज्यादा
आसान है..इसलिये सुरक्षा की दृष्टि से ये सबसे खतरनाक है..
पांचवी बात.. तुम्हारी औरतों को बुर्के से आजादी दिलाने की
लडाई हमको लडनी पड रही है जबकि हमारी लडकियों को कोई
ड्रेस पर भाषण दे तो वो हीं सामने वाले को झाड देती हैं.. एक दो
दिन पहले गुडगांव में ही हुआ है..
छठी बात.. मुगलों के आने से पहले हिंदुस्तान की औरतें घूंघट नहीं
करती थी.. नीच बलात्कारी मुगलों की गंदी नजरों से बचने के
लिये औरतों नें पर्दा करना शुरु किया..
इसलिये महाशय.. अपनी औरतों के लिये कुछ कीजिये बजाय मुद्दा
हमारी ओर भटकाने के..
क्योंकि हमारी औरतों नें जरुरत पडने पर घूंघट छोडकर, बच्चे को
पीठ पर बांधकर, मुंह में घोडे की लगाम दबा कर दोनों हथियारों से
तलवारें चलाई हैं..


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