वर्तमान की नंगी वेब सीरीज, विज्ञापन और मूवीज ने उनकी गरिमा का भी मजाक बनाया है जो इसके बिलकुल विपरीत हैं। 





भद्दे कपडे पहनना और अश्लीलता के साथ पोर्नोग्राफी आधारित फिल्मों का निर्माण होना,  रात भर क्लबों में शराब पी कर फूहड़ता भरा नाच करना , ये कुछ सबसे आवश्यक तथ्य हैं जो मनुष्य को जानवर बनाते हैं।

इन्हीं करने से घिनौनी घटनाएं बढ़ती जा रहीं है , जिनमे डकैती मर्डर बलात्कार आदि शामिल है।  मनुष्य जैसा देखेगा वैसी ही उसकी मानसिक स्तिथि होगी। 
भारत बीतते समय के साथ महिलाओं के लिए और सभ्य  समाज के लिए एक चुनौती बनता जा रहा है। 


वह समाज जहाँ बिजनेस के तौर पर महिलाओं की गन्दी विडिओ मूवीज में प्रदर्शित हो। फोटोग्राफी में फूहड़ता ठूंस - ठूंस के भरी हो, फिल्मो में भद्दी गालियां चाहे वो इंग्लिश में हो या हिंदी में, नीच भाषा में बातचीत हो रही हो वहां आप किस तरह के नैतिक समाज की बात कर सकते हैं। 

महिला सशक्तिकरण की आड़ में पुरजोर नंगपना फैला रखा है। 
शेविंग क्रीम का एड हो या जूतों का , महिला को एक सब्जेक्ट के तौर पर प्रदर्शित किया जाता है। 

विवाह से पूर्व संबंध , माता-पिता के संस्कारों की धज्जियाँ उड़ाते हुए नजर आते हैं। 

वर्तमान की नंगी वेब सीरीज, विज्ञापन और मूवीज ने उनकी गरिमा का भी मजाक बनाया है जो इसके बिलकुल विपरीत हैं। 
न्यूज पेपर या टीवी पर इस तरह के विज्ञापन आते हैं कि आप अपने परिवार के साथ पढ़ या देख नहीं सकते। 
उनमे लिखने के साथ चित्र , दृश्य भी सारी  सीमायें तोड़ने वाले होते हैं। 

मोबाइल कंपनियां आपके इनबॉक्स में मेसेज भेजती हैं कि हॉट लड़कियों से बात करे। 

क्या इस सब को हम आधुनिकता कहेंगे ? क्या इसको हम प्रगति कहेंगे ? क्या सिर्फ इन्हीं अधिकारों के लिए आंदोलन होते हैं ? 

हम अंधकार, गंदी सोच, गंदी मानसिक स्तिथि और अपने बच्चों को एक गन्दा समाज देने की ओर अग्रसर हैं। 

इस तरह की पाखंडी हरकतें आंदोलन समाज में बढ़ते हुए क्राइम को बढ़ावा दे रहे हैं। इन हरकतों को लोग टीवी मोबाइल पर देखते हैं और इनकी शिकार बेचारी मासूम लड़कियां बच्चियां होती हैं। 

केंडिल लेकर इंडिया गेट जाने से कुछ नहीं होना। बलात्कारी को फांसी की सजा आवश्यक है , लेकिन यह भी पूर्ण निदान नहीं है। 
सोचना यह है कि उस व्यक्ति की ऐसी मानसिकता क्यों हुयी जो किसी भी उम्र की महिला औरत बच्ची को नहीं छोड़ रहा ?
सोचना यह है की यह मानसिकता कैसे हुयी कि छोटे से पारिवारिक विवाद में हत्या कर दी जाती हैं?
सोचना यह है की लड़कियां लड़कों को शारब पीकर डिस्को में नाचने की मानसिकता कहाँ से मिली ?
सोचना यह है कि आज की पीढ़ी माँ-बाप से ही मेरी लाइफ मेरे रूल्स पर क्यों अड़ी हुयी है ?
सोचना यह है कि फैसले लेने में मनुष्य इतना कमजोर कैसे हुआ जो आत्महत्या जैसे कदम उठा लेता है?

ये वर्तमान सिनेमा धारावाहिकों का असर है जो युवा घर वालों से भी बागी हो जाते हैं। 

बलात्कारी व्यक्ति की मानसिकता नंगपने के फैशन शो धारावाहिक वेब सीरीज और मूवीज से बिगड़ी है जो समाज के दूसरे लोगों को चुकानी पड़ती है। 

सत्य तो ये है की ये चीजें 24 घन्टे हर समय यौन उत्पीड़न कर रहे हैं। 
युवा लड़के लड़कियां अश्लील हीरो हेरोइन को आदर्श मान कर रात भर शराब पी कर डिस्को में नाचती हैं।

लोगों को लगता है कि वो आधुनिकता की और अग्रसर हैं ,  दरसल वो नीच सामाजिक भविष्य की और अग्रसर हैं।