WHO के गलत फैसलों ने दुनियाभर के देशों को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया। चीन के कहने पर ?
कोरोनावायरस को लेकर दुनिया भर का गुस्सा अब WHO (World Health Organisation) पर निकल रहा है क्योंकि WHO एक वैश्विक संगठन के रूप में इस बार पूरी तरह से विफल हो चुका है।
WHO पर आरोप लगाए गए हैं कि वह सिर्फ चीन की बात सुनता है और चीन के लिए काम कर रहा है। इसी वजह से दूसरे देशों ने WHO की बात ना मानने का फैसला किया है। इसके चलते जो सुझाव WHO ने कोरोना से बचने के लिए दिए है उनमे से बहुत से सुझाव अब कई देश नहीं मान रहे हैं।
सबसे पहले भारत का ही उदाहरण ले लीजिये जब 30 जनवरी को WHO के महा निदेशक ने कहा था कि चीन पर यात्रा प्रतिबन्ध लगाने की सिफारिश नहीं करेगा तो इस बात के 3 दिन बाद ही भारत ने अपने नागरिको को चीन की यात्रा न करने की सलाह दे दी थी। जबकि WHO ऐसा नहीं चाहता था।
16 मार्च को WHO के महा निदेशक ने कहा कि कोरोना से लड़ने का मंत्र है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों के टेस्ट करते जाइये। फिर 22 मार्च को भारत ने साफ़ करदिया कि बिना किसी जानकारी के टेस्टिंग नहीं होगी और कहा कि कोरोना से लड़ने का मंत्र है सिर्फ "आइसोलेशन"।
WHO ने इलाज के मामले कहा की ऐसी कोई भी दवाई नहीं है जो इसमें कारगर साबित होगी जबकि भारत ने प्रयोग के तौर पर 2 ऐंटिवाईरल्स का इस्तेमाल करने को कहा और इसके बाद इसकी जगह पर हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन (hydroxychloroquine) और अज़ीथ्रोमाईसिन (azithromycin) का इस्तेमाल करना शुरू किया।
इन दोनों दवाइयों का प्रयोग इतना सफल रहा कि विश्व भर में बड़े-बड़े देश भारत से हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन दवा मांग रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इस दवाई के निर्यात के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद करते हुए कहा कि इस मदद को वो कभी भुला नहीं पाएंगे।
इसी प्रकार से ही ब्राज़ील ने इस दवाई को "संजीवनी बूटी" कहते हुए भारत का धन्यवाद किया।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार WHO की खिचाई कर रहे हैं। पहले उन्होंने WHO की फंडिंग रोकने की धमकी दी फिर कहा कि WHO को अपनी प्राथमिकताएं तय करनी होंगी।जिस तरह भगवान राम के भाई लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए भगवान हनुमान हिमालय से पवित्र औषधि लाए थे, और जो लोग बीमार थे, उन्हें यीशु ने चंगा किया और बार्टिमु को दृष्टि बहाल की, भारत और ब्राजील इस महामारी को हारने के लिए साथ आएंगे।
यह बात एक दम सही है क्योंकि WHO ने कोरोना से लड़ाई में एक के बाद एक गलत फैसले लिए और ये फैसले ऐसे थे कि इनकी वजह से चीन का फायदा हुआ और पूरे विश्व का नुक्सान हुआ।
चीन में कोरोना संक्रमण के मामले दिसंबर 2019 में ही आ गए थे अपितु WHO ने कोई भी जांच नहीं करवाई।
यहाँ तक कि 14 जनवरी को WHO ने यहाँ तक कह दिया कि इस वायरस का मनुष्य से मनुष्य में संक्रमण होने का कोई सबूत नहीं है।
और 24 जनवरी को WHO ने कोरोनावायरस को ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर दिया परन्तु यात्राओं पर प्रतिबन्ध नहीं लगवाया। इस पर WHO ने कहा की यात्रा प्रतिबन्ध लगाना सही नहीं है।
चीन को तो मानों लॉटरी लग गई है-
WHO के गलत फैसलों का फायदा अब चीन उठाना चाहता है। चीन यूरोप की बड़ी बड़ी कंपनियों को खरीदने की फ़िराक में है क्यों कि अधिकांश यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गयी यही ऐसे में उन कम्पनियो के शेयर धड़ाम से नीचे आ चुके हैं। और चीन इसी मौके का फायदा उठाने में लग गया है। हालाँकि भारत में चीन के लिए ऐसा करना सरल नहीं है क्यों भारत के कानून चीन को ऐसा नहीं करने देंगे। फिर भी चीन ने दुनिया के बड़े बड़े देशों को बिना गोली चलाये, बिना खून बहाये और बिना किसी युद्ध के घुटनो पर ला दिया है
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