कोरोना मरीज़ो को रिस्टबैंड से किये जाएंगे ट्रैक:


कोरोना का संक्रमण तेज़ी से फ़ैल रहा है। और इसे रोकने के लिए भारत में लॉकडाउन को 3 मई तक बढ़ा दिया है तथा इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है। इसमें कोई आश्चर्य वाली बात नहीं है।
वर्तमान में देश में 23,452 संक्रमित केस है तथा 723 मौतें हो चुकी है और 4,841 लोग ठीक हो चुके हैं।

कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने में सरकार को तीन जगहों पर सबसे ज़्यादा परेशानी आ रही हैं ,
पहली ये कि संक्रमण को ठीक करने में लगे डॉक्टर और नर्स ख़ुद संक्रमण की चपेट में आ रहे हैं, दूसरी ये कि हॉटस्पॉट एरिया में रहने वाले लोग घरों और आइसोलेशन में रहने को राज़ी नहीं हैं और तीसरी ये कि क्वारंटीन छोड़ कर लोग भाग रहें हैं, कई लोग लॉकडाउन और सोशल डिस्टन्सिंग के नियमों का पालन करने को तैयार नहीं हैं।

इन तीनों समस्याओं का तोड़ निकालने के लिए सरकार की एक कंपनी Broadcast Engineering Consultants India Limited (BECIL) ख़ुद सामने आई है। ये कंपनी भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंदर काम करती है।


इस कंपनी के मुताबिक़ तकनीक की मदद से इन समस्याओं से निपटा जा सकता है। कंपनी कोरोना संक्रमण से निपटने में सरकार की मदद करना चाहती है। 
अगर क्वारंटीन में रहने वाले लोगों को एक रिस्टबैंड पहना दिया जाए, जिससे उनके बॉडी टेम्परेचर को मापा जा सके, तो बहुत हद तक ऊपर की तीनों समस्याओं से निपटा जा सकता है।

कंपनी के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर जॉर्ज कुरुविला ने अपनी सोच को बीबीसी के साथ साझा किया।  उनके मुताबिक़ इस तरह के रिस्टबैंड भारत में बहुत पॉपुलर नहीं हैं। लेकिन जितने तरह के बैंड दुनिया में मौजूद है, उनका इस्तेमाल कर इस बीमारी से हम लड़ सकते हैं।
हांगकांग और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में ऐसे रिस्टबैंड का प्रयोग किया जा रहा है

कैसे करेगा काम :

कुरुविला का कहना है कि ये बैंड दो तरीक़े से काम करेगा। एक तो लोगों के शरीर के तापमान की रीडिंग लेकर बता देगा, कि किसी शख्स को बुख़ार है या नहीं।
दूसरा इस बैंड में जियो फेंसिंग की तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि ये पता लगाया जा सके कि किसी व्यक्ति को अगर क्वारंटीन में ही रहने को कहा गया है तो वो उसका उलंघन तो नहीं कर रहा। इसके लिए इस बैंड को मोबाइल जीपीएस का सहारा लेना पड़ेगा. 

कब तक आएगा बाजार में :

जॉर्ज कुरुविला के मुताबिक़ इस तरह के रिस्टबैंड बिलकुल हाथ में पहनने वाली घड़ी की तरह ही होगा। इसको बनाने वाली 4-5 भारतीय कंपनियों से वो संपर्क में हैं।
कुछ हार्डवेयर सामान उन्हें बाहर से मंगवाना पड़ेगा। सॉफ्टवेयर उनके पास है। इस प्रक्रिया में उन्हें 10 से 15 दिन और वक्त लगेगा।
कुरुविला चाहते हैं कि इस बैंड का इस्तेमाल सबसे पहले अस्पतालों में नर्स और डॉक्टरों पर हफ्ता दस दिन तक किया जाए ताकि  उससे पता चल जाएगा कि आख़िर ये रिस्टबैंड कितना कारगर हैं। सब कुछ सुनिश्चित करने के बाद ही इसे स्थनीय प्रशासन और सरकार को दिया जाए।