क्या आप भी नहीं जानते, जज और मजिस्ट्रेट में क्या अंतर होता है ?

आज हम आपको “Judge and Magistrate” अर्थात “जज और मजिस्ट्रेट” के विषय में बताने जा रहे हैं. आज हम बताएंगे कि “जज और मजिस्ट्रेट क्या है और इनमे क्या अंतर होता है?”. दोस्तों कई लोग इन्हे एक ही समझ लेते हैं. लेकिन ऐसा नहीं है, इनमे कई अंतर होते हैं. इस बात को कुछ लोग ही जानते हैं और जो जानते हैं, वो ये नहीं जानते कि आखिर अंतर है क्या?, और कुछ तो ऐसे हैं जिन्हे इनमे अंतर है यही नहीं पता है. इन्ही सब बातों के चलते आज हम आपको बताने जा रहे हैं दोनों के बीच के अंतर को. तो चलिए शुरू करते हैं आज का टॉपिक.:


  • Civil Case जिसे हिंदी में व्यवहार विधि और उर्दू में दीवानी मामले कहते है।
  • Civil Case ऐसे मामले होते है जिनमें अनुतोष  क्षतिपूर्ति की मांग की जाए। 
  • Criminal Case इसे हिंदी में दाण्डिक मामला और उर्दू में फौजदारी मामला कहते है। 
  • Criminal Case ऐसे मामले जिनमें दंड की मांग की जाए।
  • सिविल मामलों का जिक्र CPC यानी Code Of Civil Procedure 1908 में है। 
आसान भाषा में समझने की कोशिश करते हैं कि सिविल मामले क्या होते है। जहाँ अधिकारी की बात हो उसकी मांग हो, हर्जाना, क्षतिपूर्ति, या कम्पनशेसन माँगा जाए वो मामले सामान्यतः सिविल होते है। वही किसी अपराध के लिए सजा की मांग वो मामले क्रिमिनल मामले होते है। 


जज क्या है | What is the Judge in Hindi

जज हम न्यायाधीश को कहते है जो न्याय करता है और निर्णय लेता है,  ये उन मामलों को देखते हैं जो सिविल यानी व्यवहार मामले होते हैं. जिन्हे उर्दू में दीवानी मामले के नाम से जाना जाता है।  यह अदालत की कार्यवाही का पालन करते है और उसके तहत मामले के विभिन्न तथ्यों और विवरणों पर विचार करके कानूनी मामलों पर सुनवाई और निर्णय लेते है। कानून में, एक न्यायाधीश को न्यायिक अधिकारी के रूप में वर्णित किया गया है।
ये दंड नहीं देते हैं, केवल न्याय करते हैं. इनके अंतर्गत व्यवहारिक और जमीन, जायदाद के मामले आते हैं। जो अधिकार, इनमे आने वाले मामले जमीन, घर, सम्पत्ति के होते हैं. इनमे अपराध और दंड जैसे मामले शामिल नहीं होते हैंअनुतोष या क्षतिपूर्ति से जुड़े होते हैं, ये सीपीसी 1908 के सेक्शन 9 के तहत आते हैं। 

मजिस्ट्रेट क्या है | What is Magistrate in Hindi

मजिस्ट्रेट एक सिविल अधिकारी होता है, ये क्रिमिनल केस संभालते हैं अर्थात दाण्डिक मामले, जिन्हे उर्दू में फौजदारी मामले के नाम से भी जाना जाता है. जो किसी विशेष क्षेत्र, यानी जिला या शहर में कानून का प्रबंधन होता है. यह वह व्यक्ति है जो सिविल या क्रिमिनल मामलों को सुनता है और निर्णय देता है. जिला मजिस्ट्रेट या कलेक्टर जिले का मुख्य कार्यकारी, प्रशासनिक और राजस्व अधिकारी होता है.सरकारी एजेंसियों के मध्य आवश्यक समन्वय की स्थापना करता है।

 इनके अंतर्गत वो मामले पेश किये जाते हैं, जिनमें अपराध के लिए प्रावधान है और जिनमें दंड की मांग की जाती है। इसमें चोरी, डकैती, कत्ल, बलत्कार, दहेज़प्रथा, धोखाधड़ी जैसे मामले शामिल होते हैं. ये मामले क्रिमिनल कोर्ट में ले जाये जाते हैं और मजिस्ट्रेट भी वहीं अपना फैसला सुनाता है.


जज और मजिस्ट्रेट में क्या अंतर है Difference between Judge and Magistrate in Hindi 

# जज को हम न्यायाधीश के नाम से और मजिस्ट्रेट को दंडाधिकारी के नाम से भी जानते हैं.

# जज लोअर लोअर कोर्ट (निचली अदालत) में बैठते हैं जबकि मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास या सेकंड क्लास कोर्ट में बैठते हैं.

# जज व्यवहारिक और जमीनी मामले संभालता है और मजिस्ट्रेट आपराधिक मामले संभालता है.

# जज केवल न्याय करता है और मुआबजा दिलाता है, जबकि मजिस्ट्रेट न्याय के साथ दंड भी देता है.

# जज के अंतर्गत दीवानी मामले आते हैं मजिस्ट्रेट के अंतर्गत फौजदारी के मामले आते हैं.

# जज के पास आने वाले मामलों को सिविल यानी व्यवहार मामले कहा जाता है जबकि मजिस्ट्रेट के पास आने वाले मामलों में क्रिमिनल केस यानी दाण्डिक मामले कहा जाता हैं.