ऐसे क्या कर्म किये थे धृतराष्ट्र ने जो एक ही जन्म में 100 पुत्र खोने पड़े ? 



मित्रों महाभारत की कथा हिन्दू धर्म में सबसे प्रचिलित कथा है। और इस महान ग्रंथ में अनगिनत घटनाएं हैं। और प्रत्येक घटना से हमे कोई ना कोई सीख मिलती है। महाभारत कौरवों और पांडवों के बीच कुरुक्षेत्र में हुए युद्ध के बारे में है। इसमें कौरवों की पराजय हुयी थी। और सभी कौरवों की मृत्यु हो गयी थी।  

कौरव धृतराष्ट के पुत्र थे। धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे इसलिए उन्हें राजा नहीं बनाया गया। धृतराष्ट्र की जगह उसके छोटे भाई पाण्डु को राज - पाट सौंप दिया गया। जिसकी वजह से एक ही परिवार में ये युद्ध हुआ जिसे अब तक का सबसे भयंकर युद्ध माना जाता है। 

इस युद्ध में सभी कौरवों की मृत्यु होने के पीछे कृष्ण जी ने धृतराष्ट्र के कर्मों का फल बताया था। और वे कौन से कर्म थे ये बहुत ही कम लोग जानते हैं। 

महाभारत के युद्ध में अपने सभी पुत्रों को खोने के बाद धृतराष्ट्र ने भगवान् कृष्ण के सामने सर झुकाया और बोले की हे प्रभु मुझ जैसा अभागा कोई नहीं होगा। में जन्म से अंधा हूँ , मैंने अपने पुत्रों के चेहरे तक नहीं देखे। मुझे पता तक नहीं वे कैसे दिखते थे। स्वयं की याद के अनुसार मेने कोइ पाप नहीं किया।  लेकिन फिर भी मुझे अपने पुत्रों की मृत्यु का दुःख झेलना पड़ा जो कि दुनिया में सबसे बड़े दुखों में से है। ऐसा क्यों हुआ ?

तब कृष्णा जी ने धृतराष्ट्र को कर्म के नियम समझाए कि हे राजन 3 तरह के कर्म होते हैं 

१- क्रियमाण कर्म 
२-संचित कर्म 
३-प्रारब्ध कर्म 

क्रियमाण कर्म वह होता है जो हम रोजमर्रा जीवन में करते हैं। और उसका फल हमें कुछ ही दिनों में मिल जाता है। बाकी दो कर्म आपस में संबंधित होते हैं और वो धीरे धीरे संचित होते हैं। प्रारब्ध कर्म संचित कर्मों का ही एक भाग होता है। जो पहले से जन्मों के कर्मों को जोड़ कर बनता है।

 धृतराष्ट्र को कर्मों के बारे में बताने के बाद कृष्णा जी ने उन्हें अपने पिछले 50 जन्मों तक देखने वाली दिव्य दृष्टि दी। उनको दिखते हुए कृष्ण जी ने कहा कि 50 जन्म पहले वो एक बहुत ही खूंखार शिकारी था। जिसने सिर्फ अपने मजे के लिए एक जलता हुआ जाल एक पेड़ पर फेंक दिया और उस पेड़ पर बहुत पक्षी रहते थे उस जाल से 100 पक्षियों के बच्चे मर गए। और जो बचने में सफल हुए वो भीषण आग से अंधे हो गए। इस कुकर्म के कारण यह तय था कि यह जन्म में आप अंधे होंगे और आपके 100 पुत्र होंगे जिन्हे आप खो दोगे। 

धृतराष्ट्र बोले कि हे माधव उस जन्म का फल मुझे उसी जन्म में या उसके अगले जन्म में क्यों नहीं मिला ? उसके फल के लिए ये 50 जन्म बाद ही क्यों ?

भगवान ने मुस्कुरा के जवाब दिया आपके कर्म के अनुसार 50 जन्मों की आवश्यकता थी ताकि तुम इतना पुण्य इकठ्ठा कर सको जो एक राजा के यहाँ जन्म ले सको। और १०० पुत्र रत्नों  को जन्म दे सको। जिस से आपके किये गए कुकृत्य का हिसाब हो सके।
 
इस तरह से कृष्ण जी ने धृतराष्ट्र को कर्म और कर्मों के फल के बारे में बताया। 

तो मित्रों इस से ये समझना चाहिए की वर्तमान में आप जो भी कर्म कर रहे हैं उसी के हिसाब से आप अपने भविष्य और अगले जन्मों के भविष्य का सृजन कर रहे हैं। 

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