जूना अखाड़ा का गौरवशाली इतिहास 


महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं की मोब लिंचिंग में निर्मम हत्या कर दी गई । वे दोनों साधु जूना अखाड़ा से जुड़े हुए थे।  भीड़ ने दोनों साधुओं को कार से उतार कर पीट-पीट कर इन्हे मार डाला और साथ में इस वारदात के दौरान इनके ड्राइवर की भी जान चली गई। 
जैसे ही इस वारदात की खबर वाराणसी में मौजूद "श्री पांच दशनाम अखाड़ा परिसर" को मिली तो संतों में क्रोध पैदा हो गया। जूना अखाड़ा के संतों महाराष्ट्र सरकार से सख्त कार्यवाही अपील की है। 
पालघर में हत्या का शिकार हुए स्वामी कल्पवृक्ष गिरी और सुशिल गिरी अपने गुरु के अंतिम संस्कार में शामिल होने गुजरात जा रहे थे।
जूना अखाड़ा ने घटना को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है और लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद महाराष्ट्र तक कूच करने की चेतावनी भी दी है। 

जूना अखाडा की स्थापना

जूना अखाड़ा की स्थापना सन 1145 में उत्तराखंड के कर्ण प्रयाग में हुई थी। इसे भैरव अखाड़ा भी कहा जाता है। अखाड़े का केंद्र वाराणसी के हनुमान घाट पर है। 
कहा जाता है की 13 अखाड़ों में से जूना अखाड़ा सबसे बड़ा है। 4 लाख से अधिक संन्यासी सदस्यों के साथ, जूना अखाड़ा भारत में साधुओं का सबसे बड़ा गण है, जसिमे से आज विशाल बहुमत नागा बाबाओं की हैं। जिन्हें सनातन धर्म का रक्षक कहा जाता है। वे 3 तरह से योग करते हैं जो उन्हें ठण्ड बचाता है और अपने विचार तथा खानपान में संयम  रखते हैं।

नागा साधू  त्रिशूल, तलवार, शंख और चिलम से अपने सैनद दर्जे को दर्शाते है।
वर्तमान में भी हरिद्वार में मायादेवी मंदिर के पास इनका आश्रम है। अखाड़े से जुड़ने वाले सन्यासी आम जन जीवन से दूर कठोर अनुशासन में रहते हैं। 

जूना अखाड़ा एक पारंपरिक समाज है जिसमें 52 वंशों के साधु परिवारों का प्रतिनिधित्व अखाड़े की एक भव्य परिषद में उनके बड़ों द्वारा किया जाता है, जो अखाड़े के सभापति के लिए चुनाव करते हैं। एक बार किसी भी पद के लिए चुने जाने के बाद, नियुक्ति पूर्ण जीवन के लिए होती है।

वर्तमान में अखाड़े के पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज हैं। इस पद को अखाड़े का महामंडलेश्वर भी कहा जाता है। 
ऐसा बताया जाता है कि हिन्दू धर्म के संत आध्यात्मिक गुरु ने उस वक्त अखाड़ों का निर्माण किया जब देश पर कई तरह के आक्रमण हो रहे थे। अखाड़ा शब्द मल्ययुद्ध के केंद्र से बना है जहा संतों को ज्ञान के साथ शारीरिक श्रम अस्त्र शस्त्र की शिक्षा के लिए भी प्रेरित किया जाता है। उनका मानना है कि कसरत और कुश्ती से भी मन मजबूत होता है। 


आज़ादी मिलने के बाद अखाड़े ने  सैन्य चरित्र त्याग दिया। वर्तमान में जूना अखाड़ा एक शास्त्रार्थ बहस और धार्मिक विचार विमर्श के केंद्र के तौर पर पुरे विश्व में जाना जाता है।